Thursday, October 11, 2012

(आज शाम यमुना किनारे)

यमुना आज कल
बाढ़ से बौराई है . .
मटमैले पानी के
झपटते भवरोँ मे
नाचता नारियल
काली-काली
गेँद की तरह
लहरोँ के हाथोँ
ऐसे लुढ़कता
चला आ रहा

जैसे मजबूर
डूबते आदमी का
सिर हो...
कभी छिप जाता
कभी निकल आता ।
बेटे की जिज्ञासा
वो क्या है माँ ?!
कहाँ '? अच्छा, वो ऽऽ
वो तो बेटा
नारियल है !
कई दिनो से
नदी मे होगा
तो काला हो गया
चौकते हुये सा
मूँगफली छीलने लगा
बुदबुदाते हुये
कहाँ से आ गया माँ ?
फिर खुद ही बोला
कोई डाभ पीकर
फेँक दिया होगा, या
पास के मन्दिर से
कोई बहा गया होगा ।
देखो -देखो माँ
वो डूब गया...
एऽएऽएऽ व्वो
निकल आयाऽऽ
कैसा बहा जा रहा
जैसे किसी ने
किक मारा हो ।
नारियल पय मेरी भी
नजर थी ... ...
नारियल लहरोँ की
चपेट मे आ जाता तो
मटमैली सतह उसे
लील लेती
लेकिन लुढक कर
खड़े हो जाने वाले
खिलौने की तरह
थोड़ी दूर जाकर
वह फिर सिर
निकाल लेता...
'काश' एक किक
मुझे भी कोई मारता
मेरा मन भी उस
दूर होते नारियल की
तरह, डूबने उतराने को
आतुर होने लगा.... ... !!