Monday, July 16, 2012

ये किस 'लोक' में
बांह पकड़ ले जाते हो मुझे...???

नर्म दूब पर
झिलमिलाते ओस-कण...
मोतियों से टूटते पांवों की आहट से,

ऊँचे-ऊँचे
कन्दराओं के बीच
हम दोनों विचरते ...

ओह !!
तुमने दिखाया तो
पुष्पों की वाटिका ...!

कुछ पुष्प खिले ,
कुछ अधखिले
कुछ स्वछन्द ,
पवन से अठखेलियाँ करते

देखो !
ऐसा मत करो
इन्हें मेरे केश में न गुथों
इन्हें उंही झुमने दो ,अच्छे लगते हैं

पर तुम नहीं मानते
एक शिशु की भांति मचलते हो
मुझ संग प्रीत मलते हो ...

मुझे रचते हो,
मुझमे प्राण भरते हो...
मै जी- जी उठती हूँ
तुम्हारी दी चेतना से ... !!
सुन...,
मन ले चल ,
उस ओर जहाँ
पीपल के पत्ते
आपस में बात करते हैं ...
जहाँ...
टेबल की जरुरत नहीं होती ...
शब्द ....
मन की कागज़ पर
टंकित होते जाते हैं धडाधड...
जहाँ तुमसे कहने को
कुछ... लिखना ना पड़े ...
और तुम बिन कहे
सब समझ जाओ
हाँ एक जगह है....
मेरे दिल का सुनसान कोना...
जहाँ तुम अमृतत्व की
बरसात किये थे उस दिन...
वो गर्माहट नहीं आती तुममे अब ...
पर ...
वो बाज़ारवाद की
चपेट में कभी नहीं आयेगा ...
चल मन वहीँ चल...!!