Tuesday, October 30, 2012

'इक गंध घुलती है'

'इक गंध घुलती है'

'तेज धूप वाली
दुपहरी में' जब
कोई पगला बादल
बरस जाता है...

उसके ठीक बाद
जैसी गंध आती है ना?

ठीक वैसी ही...
गंध घुलती है जब
तुम चुपके से
मुझे 'नीहार' जाते हो... !!

Sunday, October 14, 2012

अंतर्द्वंद

 अंतर्द्वंद
बिवश कर देता
हाथ चल पड़ते
रच जाती है
शब्दोंको मिलाकर
मन की पीड़ा से
मिश्रित
एक कविता

भाग नहीं पाती
इन शब्दों को बेवश छोड़

कई बार सोचती
कि अब नहीं....
अब नहीं !

अब सब छोड़
शांति की सांसे लूँगी
पर ऐसा होता नहीं
तन- मन कि पीडायें
झुण्ड बना ...
शब्दों को धकेल
दिमाग पर हाबी होते
और हाथ
चल पडतें है...शब्दों के सफ़र में ... ... !!

एक अफ़सोस

कभी सोचा ही नहीं
एक दीवार ...
जिसकी सीमायें अनंत थी

उसके भीतर मैं
पतंग की भांति
स्वतंत्र थी...

अपनी उड़ान
भरने के लिए
अपनी शरीर की
सीमाओं को तोड़कर...

जहाँ एक पुरुष
मेरे लिए
कभी मर्द नहीं रहा...

लेकिन आज मैं
स्त्री क्यूँ बन गयी ?
किसके लिए ...

ये जानकर कि
वो पन्ने....
कभी पलटेंगे नहीं

वो दिन कभी
लौटेगे नहीं
लेकिन
एक अफ़सोस
उस अहसास को
आज भी
जिंदा किये हुए हैं
जिसे मैंने
समझने में मैंने
एक दुनिया
बदल डाली ...

उस दुनिया का
हिस्सा न होकर भी होकर ......
आज क्या उसे अर्पण करू...
"वो" तो 'शरीर'
और 'तमाम' सीमाओ से... ऊपर हैं... .... !

Thursday, October 11, 2012

ओह !
किस कालीदास ने
अचानक से
मेघ भेज दिए ...

तीन रातेँ ,
तीन दिन से
लगातार बरसते रहे मेघ
अब थोड़ा
थके से हैँ...पर

कोई भरोशा नही
कब टपक पड़ेँगे

गाँव होता तो
पोखर भर आया होता
कुईँया उफना आयी होती
खेतोँ की पगडडी दिखती नही
और मै
हिरनी सी, लहराती
बलखाती इठलाती
कभी पोखर से
कमल तोड़ लाती
कभी मेढकोँ संग
टरटराती ...
कीचड़ से सने
घर आती
बाबा की डाँट खाती
माँ मुझको समझाती
अपनी जिद मनवाने खातिर
बिन बात के रोये जाती
बिन बात के रोये जाती... ... !!
फूलोँ की
पाखुरी पर
लिखे गये खत
मेरे नाम जो,

सांझ होने तक
मुरझा गये. . .

कहीँ
आपका प्रेम भी,

जीवन की
सांझ होने तक
मुरझा न जायेगा... ... ???
भीतरी उठा-पटक,
कशमकश तथा बाहरी
खीँचतान से उबकर, आखिर
फट ही पड़ा आसमान...
और घनघोर बारिश
पहरोँ हुई...
पुरवईया का थपेड़ा
कब तक सहे... ... ... !!
साँझ का बजरा
रात का किनारा छुने लगा,
जैसे कोई मुर्दा क्षण..
अन्धेरे होते पल का..
एक सिरा सूरज और
दुसरा सिरा चाँद के हाथ,
और उसे चुपचाप दोनो
रात के सन्नाटे मेँ
कहीँ दफनाने जा रहे होँ... ... !

(आज शाम यमुना किनारे)

यमुना आज कल
बाढ़ से बौराई है . .
मटमैले पानी के
झपटते भवरोँ मे
नाचता नारियल
काली-काली
गेँद की तरह
लहरोँ के हाथोँ
ऐसे लुढ़कता
चला आ रहा

जैसे मजबूर
डूबते आदमी का
सिर हो...
कभी छिप जाता
कभी निकल आता ।
बेटे की जिज्ञासा
वो क्या है माँ ?!
कहाँ '? अच्छा, वो ऽऽ
वो तो बेटा
नारियल है !
कई दिनो से
नदी मे होगा
तो काला हो गया
चौकते हुये सा
मूँगफली छीलने लगा
बुदबुदाते हुये
कहाँ से आ गया माँ ?
फिर खुद ही बोला
कोई डाभ पीकर
फेँक दिया होगा, या
पास के मन्दिर से
कोई बहा गया होगा ।
देखो -देखो माँ
वो डूब गया...
एऽएऽएऽ व्वो
निकल आयाऽऽ
कैसा बहा जा रहा
जैसे किसी ने
किक मारा हो ।
नारियल पय मेरी भी
नजर थी ... ...
नारियल लहरोँ की
चपेट मे आ जाता तो
मटमैली सतह उसे
लील लेती
लेकिन लुढक कर
खड़े हो जाने वाले
खिलौने की तरह
थोड़ी दूर जाकर
वह फिर सिर
निकाल लेता...
'काश' एक किक
मुझे भी कोई मारता
मेरा मन भी उस
दूर होते नारियल की
तरह, डूबने उतराने को
आतुर होने लगा.... ... !!