Sunday, June 2, 2013

विरल था वह स्वप्न



अनूठा....
कोई जंगल...घना....
हरीतिमा से भरा हुआ
हम दोनों साथ साथ....

मैं कभी उत्साहित होती
कभी..
जंगल की गहनता से
सहम कर लिपट जातीं तुझसे

फिर नदी मिली....
झिर-झिर बहती...
रेत के तट पर...बैठे रहे हम दोनों...

तुम्हारी गोद में
सिर रखकर सोई रहीं मैं
और तुम मेरे बालों में
उंगलियां फिराते रहे

फिर घर....छोटा सा....
सफेद चादरों वाला बिस्तर
और नीले रंगकी अपराजिता के फूल सी मैं !

फिर..
स्वप्न टूटा क्यूँ......???