Friday, March 21, 2014

जो बंद पड़ा

भीतर ही भीतर
मन की गहराइयों के
तले-तले
इक ज्वार सा
चलता रहता है..

बाहर और भीतर के
बीच एक किवाड़ है,
जो बंद पड़ा
बाहर से भी
और भीतर से भी..

भीतर बराबर कुछ
गिन-गिनाव लगा है
कोई हिसाब,कोई किताब
चल रहा है...कि
बाहर से कब क्या
आया था...क्या आएगा
क्या गया...
क्या जाएगा..क्या बच जाएगा ..