Thursday, October 1, 2015

वह जामुन का पेंड़


वह जामुन का पेंड़
जिसकी जमीन से ऊपर
उभर आई जड़ों पर बैठते थे बाबा
अपनी विशाल विराट देंह को छोड़
उड़ गये..न जाने किस ओर
तोड़ गये सारी गांठे
जो बेटे बहुओं और
दादी, पोते , पोतिओं से बंधी थी
तोड़ गये सारे नेह बंधन
और दे गये एक अकुलाहट ...
अब जब भी पुकारते हैं हम
बाबा...
खो जाती हर पुकार
डूब जाता वह जामुन का पेड़
एक अछोर मौन में... .... !