Thursday, May 24, 2018

घुसर आकाश आंधी से घुटा-घुटा सा

हवा चिघाड़ती सी
सब कुछ रौंदती
लाचार पेंड- पौधे नतमस्तक
आपस मे ख़ुसूर-फुसुर करते कमरे के परदे
अजीब हतासा से फड़फड़ा रहे
बाहर पीली भूरी रेत ही रेत छाई हुई
घुसर आकाश आंधी से घुटा-घुटा सा
ऐसे सांझ से उबरना मुश्किल
अकसर भीतर का घना अवसाद
सूरज की बुझती रोशनी के साथ
और तीब्र हो
निकट और निकट चमकना शुरू कर देता है
मन छटपटाने लगता है
बरबस पुकार निकली
कोई है !कोई है! जो
भीतरी सलवटों को छूकर
पावस कर दे?
गहरी सांसें आती है और बताती
उसे अपनी दायरों को खुद भरना होगा
सत्व और चेतना का विस्तार करना होगा
तभी यह एकांत उसके आत्म का अंग बनेगा
एक दिन यही समय उसका अपना होगा
उसके वशीभूत होगा...!