Thursday, September 5, 2013

दो प्रेमी..



हीर और राँझा
जिनके नाम पर
आज सारी दुल्हनो
और दुल्हों को ,हीर राँझा हीं
कहा जाता है...

बेचारी हीर ,
बेवफा दुनिया के
जालिम हाथो से न बच सकी
और राँझा
रोता हीं रह गया

ये दुनिया अब
मेरे किस काम की है ...?

यदि उसका प्रेम
अँधा हीं होता
तो क्या वह इस
स्वार्थी दुनिया से
कोई दूसरी हीर नहीं ढूंढ़ लेता..?

प्रेम हमेशा से
पवित्र रहा है
वरना 'चेनाव नदी'
आज भी न सिसकती
सोहनी और महिवाल के लिए... !!