Tuesday, February 28, 2012

''पूर्ण नहीं होती''

दिनचर्या की
हाड-तोड़ मेहनत के बाद
जब भी खाली सपहे पर
उकेरना चाहा तुम्हे..
तुम 'पूर्ण 'नहीं होते...

हार के आती...
सपहे को झाड़ती,
रंगों को निहारती
देखती.....
पलट,पलट,पलट
कमी क्या है मुझमे ..?

शंका रूपी नागिन की
हिलती पूंछ की तरह
मन शंकित होता...!

मन खुद से कहता ...
ऐसे शंका का क्या...?
शंका कर.....
नचिकेता की तरह
श्वेतकेतु की तरह शंका कर
भातखंडे के संगीत वाले
शिष्य की तरह शंका कर
जो,कुरेद-कुरेद कर
रागों का तत्व निकालता
और उसे आत्मसात करता ..!

फिर मै अपने से कहती....
मेरी शंकाएं तो 'फटीचर' की तरह है
जिसे रंगों का ज्ञान नहीं...वो
बनाने चली 'तेरी' 'सम्पूर्ण आकृति' ...???