Saturday, October 11, 2014

सिर्फ औरों को ही हैं ?

उसे बोलना मना है
कब बोले? कब ना बोले?
किसको बोले? या किससे बोले?
खुद ‘उसे भी तो’
है बोलने का हक
या सिर्फ औरों को ही हैं
किसी को भी
किसी से भी
न बोलने के
फरमान जारी
करने के सारे हक... !!

Tuesday, April 1, 2014

माँ का मन



कभी-कभी

एकाएक
न जाने कितनी स्मृतियाँ
मन-दर्पण में प्रतिबिम्बित
हो जाती हैं एक साथ मुखर

उतर आता हैं
आँखों में
वह रूप, वह छवि
जिसका आदि, ना अंत
इतना अपना... इतना कि
तर्क की डोर खुलबिखर जाती है

कभी
कुछ होता है ऐसा भी
धूल अटी, मैली हवा
अधबनी-अधूरी बातें
घांव-घांव करता अंतर्मन
समझ से परे
घुंघुआता घुमड़ता..हु-हकार

पता नहीं
कहाँ चली जाती हैं
वे उमंगें?
वह स्वास्थ्य कामना
देंह झुलसती
जैसे किसी भाड़ में

और फिर...
कभी जब
इस अलक-सलोरे के
सुख शीतल गोरबदन पर
हाथ फेरते...
बिसरने लगता है सब
अंग-अंग गुदगुदाता ...

दुलारती वह,
लाड़ लगाती
हँसता बच्चा
हँसती वह
माँ का मन
फिर से जुड़ जाता है ...!!

Friday, March 21, 2014

जो बंद पड़ा

भीतर ही भीतर
मन की गहराइयों के
तले-तले
इक ज्वार सा
चलता रहता है..

बाहर और भीतर के
बीच एक किवाड़ है,
जो बंद पड़ा
बाहर से भी
और भीतर से भी..

भीतर बराबर कुछ
गिन-गिनाव लगा है
कोई हिसाब,कोई किताब
चल रहा है...कि
बाहर से कब क्या
आया था...क्या आएगा
क्या गया...
क्या जाएगा..क्या बच जाएगा ..