Sunday, May 1, 2016

प्रेम में

खुद को विसर्जित कर देना
किसी के लिए
किसी को
आसान नही होता
आसान तब होता है प्रेम में
हम जब विसर्जित होते हैं
सौंपते हैं पहाड़ों भरा आकाश
लहलहाते अरण्य वन
कोमल पत्तियों सी
ह्रदय का यह पट
हाँ....सौंपते हैं
अपनी बूँद-बूँद लहू
रातों की नींदें
विसर्जित करते हैं अपने अहम्
क्यूँकी..तब होते हैं हम प्रेम में ..!!

Monday, January 4, 2016

स्पर्श: कवयित्री वसुंधरा पाण्डेय की 8 कवितायेँ

स्पर्श: कवयित्री वसुंधरा पाण्डेय की 8 कवितायेँ: ’ मेरे लिए कविता लिखना सांस लेने जैसा है – मुझमें जीवन ऊर्जा का संचार करती हैं कवितायेँ /और मेरा मानना है कि कविता में प्राण तत्वों की...

Saturday, January 2, 2016

तुम्हारी याद

कोलाव तट की 
सोने की रेत बीनती 
सपनो के पंख फड़फड़ाती 
पहाडी सांझ सी उतर मेरे आँचल में 
सितारे टाँकती 
.....तुम्हारी याद ..!
सिहरन भरी हवा सी
आकाश के सूनेपन में बजती
अनुभूति की तरह नदी को
छूती सहलाती बहती चली आती...
तुम्हारी याद है कि सखी मेरी .. ...!!


Tuesday, December 29, 2015

साहित्य अमृत पत्रिका के जनवरी 2016 के अंक में प्रकाशित मेरी पहली कहानी

वसुन्धरा पाण्डेय की कहानी

साथ दोगे न मितवा
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बचपन में दशहरा के मेले से एक पेंटिग खरीद लायी थी. पेंटिग क्या था... आसमान में स्वछंद उड़ान भर रहे परिंदों को निहारती, कमजोर परों वाली एक छोटी सी चिड़िया की पेंटिंग.  पता नही क्या दिख गया था मुझे उस में ...तब शायद सात की थी, पेंटिंग की क्या समझ होनी थी. फिर भी कहीं न कहीं, कुछ न कुछ जुड़ रहा था, मेरे अंतर्मन की किसी ग्रन्थि से कि अनायास ही, मेला घूमने को मिले दस रूपये में से सात, उसे देखते ही दुकानदार के हवाले कर दिए.
कहते हैं, अतीत हमारी मूर्खताओं का चलचित्र होता है. पर क्या सच में... यह मेरी उस समय की मूर्खता रही होगी...?
शायद नहीं ! शायद उस समय मुझे अपनी स्थिति का सहज अनुमान रहा होगा. शायद उस चिड़िया की विवशता,  कहीं न कहीं  मेरे बालमन को प्रतिबिम्बित कर रही थी.  कि बार-बार उसे देखती और सोचती कि इसके पंख इतने कम क्यों हैं ? इतने कम कि कहीं-कहीं देंह का चमड़ी भी दिख रही थी, पर कितनी आतुर थी उड़ने को वह चिड़िया.. और उसका आकाश को निहारना. शायद मेरी तरह,  अपने माँ-बाप से बिछड़ कर, जंगल की जमीन पर आ गिरी होगी !
 आह !! कोई उसे उड़ना सीखा देता...
 इंसानी बच्चें हो या पशु-पंक्षी के... पर क्या कोई गैर, किसी को उड़ना सिखाता है, सिवा माँ-बाप के या फिर समय के..?  समय भी अच्छा शिक्षक है... लेकिन, कठोर है, बहुत कठोर..!
कई बार अपने आँगन की अलगनी पर देखती, चींचीं चूंचूं करती फुदकती गौरैया को.., खपरैल में कई जगह अपने  घोसले  बनाये हुए चिड़ियों का जोडे ...अंडे देती हुईं,  बारी-बारी से अंडे सेते, चिड़िया और चिडा...! कई बार एकाध अंडा गिर जाता तो कितना शोर मचता था. उनकी उस शोर मचाने वाली भाषा में दुःख कितना गहरा रहता होगा. शायद आदमी के लिए इसका अनुमान लगा पाना सम्भव नहीं. पता नहीं, जीवन में नैसर्गिक  सुख की तरह नैसर्गिक दुःख भी उतने ही घनीभूत होते हैं या नहीं ?
कई बार उनको खुश होते हुए भी देखा था मैंने...घोसले  में उनके बच्चे ची ची, चूं चूं कलरव करते हुए...गौरैया,गौरा -कहीं से उड़ कर आते और चोंच में लाये हुए दाने उनके चोंच में डाल देते...आह ! कितना सुखद होता था उस समय उनका चहकना और उछल-उछल कर चोंच से दाना खाना...और उनकी ख़ुशी मुझे आनंदित कर जाती थी. तब मैं वहीं चारपाई पर बैठे , लेटे हए या पढ़ते हुए या बरामदा आँगन बुहारते हुए या संयुक्त परिवार में से किसी सदस्य के दिए हुए कोई काम निपटाती, और उन्हें निहारती रहती...!
 अभी सोचती हूँ सयुंक्त परिवार किसे कह रही हूँ...?
 माँ और  पिता तो वहां रहते नही थे, मैं और मेरे छोटे भाई का रहना होता था, उस बड़े सयुंक्त परिवार में...जहाँ एक अदद दादी थी, पिताजी की सौतेली माँ,  बाबा थे, पिता के पिता होते हुए भी, अपनी उस दूसरी वाली  के होकर रह गये थे. भरा-पूरा परिवार मेरी उस सौतेली दादी का था. दो बेटे बहुएं... उनके बच्चे... महरी, धोबिन, कुछेक और नौकरों साथ हम भाई-बहन भी नौकर...!

कई बार मेरे बाल मन को बहुत तकलीफ होती थी, जब बुखार में तपती रहती थी उसी बरामदे वाली चारपाई पर कई-कई दिन...
शायद, माँ बाप के साथ ना रहने के बिछोह का बुखार होता था, या मेरी गल्ती ना होने पर भी, किसी और की गल्ती की डांट खाने का बुखार, या फिर माँ-बाप की छत्र-छाया में पलनेवाले और उनके अभाव में पलनेवाले बच्चों के साथ होने वाले भेद-भाव का बुखार, जिसमें सुबह दातुन के बाद सब बच्चों को मिलने वाले पार्लेजी बिस्कुट से मुझे वंचित रखा जाना भी शामिल था...!
 पर उस बुखार की कोई दवा नहीं होती थी. पता नही, बिन दवा के कैसे ठीक हो जाता था.  सुबह चाय के साथ रात की बची रोटी खाने से, या तीसरे आँगन में घनघोर तुलसी मईया की महक से, या गिरे हुए तुलसी पत्रों को चबा जाने से  या पोई की लतर  से लिपट कर खेलने से, या मेहंदी अनार के उफनती  महक से या अरुई का पता तोड़, लाकर किसी  से उसका  साग बनवा कर खा लेने से या गौरैया को उनके बच्चों को भोजन खिलाते देख... वह बुखार उतर ही जाता. पर कैसे ?..ठीक ठीक याद नही..
पता नहीं, धुंधली सी ये सब यादें एक साथ क्यों चली आ रही हैं ?
---“स्मृतियाँ ऐसे ही खेल कूद किया करती हैं....विवरण ठीक से आ रहा है न ?”
---“उफ्फ्फ...बहुत सुन्दर...अद्भुत.. पर एक बात.. रुकिए...!”
---“बोलो”
---“और नौकरों के साथ, हम भाई-बहन भी नौकर..??”
---“क्यों ठीक नहीं है क्या?”
---“भाई नही... उसे ठीक से ही रखा जाता था... मेरे से ही उसका काम भी लिया जाता था..!--वह  बचपन से दादा-दादी के पास रहा ..पता नही क्या लगाव था उन लोगों को उससे...! कहीं भी जाते, एक साल का था, तबसे उसे लेकर जाते थे...! कुम्भ मेला में भी लेकर गये थे...सब कहते थे, जो देखता था, कि बूढ़े-बूढ़ी को लगता है बुढापा में बच्चा हुआ है...!”
---“तुम ...तस्वीर  की बात कर रही थी  जो,  मेले से खरीद लायी थी... क्या बना उसका ?”
---“बारिशों के मौसम में अक्सर खपरैल घर चूने  लगते हैं और हर साल खपडों की अदला-बदली में कई बार दीवारों से लग कर बहे हुए बारिश के पानी से पेंटिग धुंधला गयी थी. आज अब उस पेंटिग को सोचती हूँ तो सहज ही अनुमान लगता है, बनाने वाले या बनाने वाली के मन की बेदना का. ...मुझे याद नही की किसी पुरुष ने बनायी थी या औरत ने...
याद आ रहा है  जब तेरह साल में प्रवेश की थी और उस साल भी मेले से एक पेंटिंग लाई थी ...बेहद खूबसूरत और रंगीन, इतने सारे रंग थे ....सारे रंगों का समायोजन , अद्भुत बन पडा था, लगता था बनाने वाला, जीवन की रंगीनियों से खेलना चाहता हो जैसे...!”
सात और तेरह बरस, दोनों उम्र की पेंटिंग की खरीदारी का अर्थ भले ही अभी तक नहीं समझ पायी हूँ ...क्या और क्यूँ? ...लेकिन किशोरावस्था की वे बंदिशे, वह जकडन, वह भेद-भाव उन लम्हों की कसक,  आज भी बहुत कसमसाती, तडपाती है...आखिर, हम लडकियों को ही क्यों झेलना होता था यह सब ..क्यों नहीं उड़ने दिया जाता था... उन्मुक्त परिंदों की तरह ...???
बीते को लिखने लगूं तो  पता नहीं क्या-क्या रिसता चला आये !
अब, जब-तब, मन का बिक्षिप्त होना, इस लाईलाज बिमारी में जकड़े जाना, इस सबके बीज और जडें,  मुझे वहीं दिखाई देते हैं..!
इसके बाद भी हम लडकियों में कैसी जिजीविषा होती है...इस तकलीफ को भी अपने हौसले से आज तक मात देती आई हूँ...क्यूंकि, मुझे असहाय होकर, उड़ते परिंदों को देख रही, पेंटिंग वाली चिड़िया नही बनना था..जो कि मैं थी..

बहुत हो लिया जिम्मा-जिम्मेदारी. अब एक गुणात्मक जीवन जीना चाहती हूँ.. मात्रात्मक नही... बीते लम्हों जैसे लोगों की चुचुआहट,  मेरी जिन्दगी का एक-एक लम्हा कम कर देते हैं. अलग-अलग लोग..अलग-अलग इलाज..!  अब बचे-खुचे जीवन को बेहद सार्थक करना चाहती हूँ. जो भी दिन, साल, दशक, दो दशक जियूँ अपने हिसाब से जीना चाहती हूँ ....
हाँ..! मैं उड़ना चाहती हूँ  अछोर आसमान में, अपने समग्र अस्तित्व के साथ.. साथ दोगे न.. मितवा.. ..।

Thursday, October 1, 2015

वह जामुन का पेंड़


वह जामुन का पेंड़
जिसकी जमीन से ऊपर
उभर आई जड़ों पर बैठते थे बाबा
अपनी विशाल विराट देंह को छोड़
उड़ गये..न जाने किस ओर
तोड़ गये सारी गांठे
जो बेटे बहुओं और
दादी, पोते , पोतिओं से बंधी थी
तोड़ गये सारे नेह बंधन
और दे गये एक अकुलाहट ...
अब जब भी पुकारते हैं हम
बाबा...
खो जाती हर पुकार
डूब जाता वह जामुन का पेड़
एक अछोर मौन में... .... !