Monday, September 9, 2013

कथादेश अंक 13 के जुलाई में छपी सात रचनायें






(तुम और मैं श्रृंखला की कुछ कविताएँ)

एक

उफनते गरम थपेड़ों सा प्यार
पिघल गयी हूँ मैं
घटाओं सा उमड़ता प्यार
धारा हुई मैं
साँय-साँय झरते
पतझड़ के पत्तों सा प्यार
चुप्प हुई आहट सी मैं
जैसे सर्द लहरों का तामझाम
नर्म, मुलायम रुई के फाहे में ...
लिपटा प्यार
प्यार
हर मौसम का वसंत है


दो

सूरज घुटे तो घुटे
चाँद छिजे तो छिजे
अपना तो
तितली सा मन
उड़ेगा ही
गुलाल की दीवार है
इंगुर की छ्त है
कमल का पलंग है
फूलों की सेज है...

खुशियों का झूला तो
झूलेगा ही...

तितली सा मन तो
उड़ेगा ही...!

तीन


मेरे देवदूत,
सुबह जैसे मासूम तुम
प्रभाती गाते
जगाते फूलों को
पंखुरियों को खोलते
अपनी छुअन से
उड़ाते पराग
अपनी साँसों से
देवदूत मेरे,
तुम्‍हारी आहटें छेड़ती हैं
मेरे भीतर की नदी को और
लहरों को

कैसे बाँधा था
तुमने मुझे शब्दों से..
जैसे तितली को
रंगों से ही पकड़ लिया

तुम्‍हारे शब्दों के बादल में
मैं चाँद सी खोयी
अपने अक्ष से टूटकर
धरती-सी घूमती रही
भटकती रही
सूरज की तलाश में ...







चार

वह जो प्रत्‍यक्ष होना चाहता है
प्रतीक्षा में है
सदियों से बंद
जंग लगे किवाड़
सिर्फ़ खट-खट से नहीं खुलेंगे
आओ,
उतरो अँधेरी तहों में
निर्भय पुकारो
पुकारो कि गूँजें दिक्-दिगन्‍त
अरमान और संकल्‍प
चुने हुए विश्‍वास
विराट सपने
और कविता
सब साथ हैं तुम्‍हारे
तो चलें उस दिशा में
जहाँ प्‍यार और जीवन
प्रत्‍यक्ष होने की प्रतीक्षा में है




 
पाँच

इस तेज धूप दुपहरी में

बरस गया
इक बादल पगला-सा
दे गया गंध
ठीक वैसी
जैसी
घुल जाती है  मुझमें
जब चुपके से
निहारते हो तुम...



छह

लट्टू की लपेट
तेरा प्‍यार

मैं नाच रही हूँ
गोल-गोल
अपनी ही धुरी पर

जैसे नाच रहा ब्रह्मांड.

सात 

देव ..

मैंने तुम्हे वरा था...
गहन अन्धकार में
टिमटिमाते तारों के साक्ष्य में
और दिव्यता
उतर आई थी हम पर

तबसे हम
'हम' नही रहे...
हमें पेड़ से टपके
ज्ञान का फल मिल चुका था
हमें ज्ञान मिल चुका था...!

जैसे प्रलय के बाद
वायु के लहरों पर तैरते हुए
हम...
ऊपर आकाश
उठते चले गये

भू: नही,
भुव : नही ,
स्व : नही
पृथ्वी नही,
आकाश नही ,
श्रृष्टि नही,
जन्म नही ,
वरण नही,
एक नही, अनेक नही

प्रेम के समक्ष
कुछ नही, कुछ भी नही... ..!!