Saturday, October 15, 2011

मौसम...चार

बदलते पाया है तुम्हे
मौसम की तरह...
कभी उफनती
गरम थपेड़ों की तरह ...
प्यार करते हुए ...
बस तेरे आगोश में...
पिघल सी गयी हूँ 'मै',
जैसे..........
लौह,पिघलता हो
गर्म आँच पाकर...
कभी बरसात की
घटाओ की तरह....
जो उमड़ कर अपना
सारा प्यार...
धरती पर...
लुटा देना चाहता हो...
कभी....
ठंड की थपेड़ों की तरह
जैसे....
नर्म ,मुलायम रुई के फाहे में ...
किसी...नवजात को
बचाने की कोशिस में...
खुद का ख्याल ना होना
कभी पतझड़ की तरह ....
जब हर आहट
सांय-सांय करती हो...
और....एक अनजानी सी
डर के कारण
मै दरवाज़े के पल्ले को
पीठ के सहारे
दबा के खड़ी हूँ ...
की कोई एक झोका
पल्ले को हिला ना जाये
इन चार मौसम का
प्यार तुम्हारा अद्भुत है
जिसे सिर्फ मै समझ पाती हूँ
सिर्फ मै...Vasu