Wednesday, September 14, 2011

बोनसई


 

तुम जानते हो बहुत बड़ी हूँ

पर तुम्हारे
संकुचित विचारों के कारण
हूँ यहाँ...गमले में सजी


छोड़ के देखो मुझे
खुली जमीन में
नजरें उठानी पडें
टोपी सम्भालते हुए
और वही तुम नहीं चाहते

तुम्हारी आशंकाएं
निराधार भी नहीं हैं

क्या बनेगा
तुम्हारी शान
और अहंकार का
जो गमले से निकल
पा लीं मैंने जमीन
और छू लिया आसमान...!!



बोनसाई पौधे को अदबदा कर छोटा बनाने की अस्वाभाविक प्रक्रिया का उत्पाद है .पौधे के कुदरती विकास के साथ खिलवाड़ है .हमारे बनाए समाज में लडकियां औरतें भी बोनसाई बना रखी जातीं हैं ...!!