Sunday, September 11, 2011

तुम 'ही' मै हूँ


मेरी चांदनी ...
तुम..हो ही ऐसी ..
तुझे याद क्यूँ न करूँ...
मेरी गुलाब तो
तुम ही हो
बागों का गुलाब
क्यूँ याद रखूं,
वो सावन की
पहली बारिश ..
जब हम साथ थे...
भींगे..
वो लम्हा
भूलता ही नहीं
फिर याद क्या रखूं,
वो भींगे हुए
गेसुओं को देख
जब मै भ्रम में था
कि
घटा है या गेसू.....
और लिपट गया था
तुझमे..
वो भुला कब कि...
कुछ याद करूँ,
हर पल नुरानी बन
समायी हो...
मेरे जेहनो जद्द में
सुबह कि रंगत को
याद क्यूँ करूँ...
सच तो ये है प्रिये...
तुझे भूल पाता नहीं...
फिर क्या याद करूँ ...
क्या याद करू......Vasu