Friday, September 9, 2011

प्रिये '...



तुम्हारी बिंदिया ने
सूरज को ढँक दिया है

तुम्हारे कंगन में मैंने
चाँद को जड़ दिया है

रात अकेली सी
जब तुम्हारे खुशबुओ से
महक उठी तो ...
अमावसी रात भी
तुम्हारे पाजेब की
झंकार से ...
पूर्णिमा में बदल गयी

उस झंकार से
आज भी मेरा घर
रौशन होता है

तुम तो यहीं हो
हर दम मेरे पास
मेरे ख्वाब तो
परिपूर्ण है प्रिये

मै 'तुम' संग न
होके भी ....
तुम संग हूँ ...!!