Tuesday, August 20, 2013

स्वप्न में जी रही


तेरी ही शब्द रचना हूँ
कितने प्यार से
रचा है तुमने मुझे

सब याद है
जो कुछ भी
तुमने मेरे साथ किया

वही सब
जो वसंत करता है
फूलों के साथ

प्रसन्न पुष्प सी
खिल गयी हूँ मैं

मेरी देह में तेरी गंध
समा चुकी है..

एक सम्मोहन
दो काया को एक कर के
स्तब्ध सा खड़ा
सम्मोहित
अपने ही कृत्य पर

मेरी धडकनों में
तेरा प्रेम साफ़-साफ़
सुनाई दे रहा है
मनमीत के
अधर अनुराग का संगीत
अभी तक थिरक रहा है

तेरा वह चुम्बन
मुझे याद है प्रिय
जिसके ताप ने
मुझे शीतल किया

निशा साक्षी वह समागम
किस विलक्षण प्रणयसूत्र में
हमें बाँध गया...

मुझे याद है...!